भारत के इतिहास में एक से बढ़ कर एक सुर वीर है l हर एक सुर वीर की अपनी एक खास जगह है भारत के इतिहास में l कुछ ऐसे भी हैं जिनको पूरा देश नहीं जानता l क्योकि वो बस किसी राज्य तक ही सीमित रह जाते हैं l इसका कारण ये हैं कि उनका नाम देश के हर राज्य कि इतिहास कि किताबों में नहीं मिलता l ये तो सरकारों को सोचना चाहिए कि जो देश के सुर वीर है वो बस एक राज्य के नहीं अपितु वो पूरे देश के वीर है l ऐसे ही पंजाब के एक वीर योद्धा थे बंदा सिंह बहादुर l
पर वह तो बाबा बंदा सिंह बहादुर थे वाह इतने बहादुर थे कि उन्होंने कभी भी इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया। मुगलों ने अपनी क्रूरता का परिचय दीया। बाबा बंदा सिंह बहादुर को किलो वाले पहियों के बीच से गुजारा गया। उनके शरीर के मास को एक-एक करके नोचा गया। फिर भी उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया और बड़ी जोर के साथ इस्लाम धर्म को ललकारा। इतनी क्रूर यातनाओ के चलते वह बेहोश हो गए। जब उनको होश आया तो उनके सात साल के बच्चे को उनकी गोद में रख दिया गया। उनके सामने ही उनके बच्चे का कत्ल कर दिया गया और उनके बच्चे के कलेजे को उनके मुंह में डाल दिया गया। इसके बावजूद भी उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया। बाबा बंदा सिंह बहादुर की बहादुरी के आगे मुगलों के क्रूरता हार चुकी थी। अब मुगलों ने सोचा कि उनकी क्रूरता का बाबा बंदा सिंह बहादुर के ऊपर कोई भी असर नहीं हो रहा। अंत में जब मुग़ल थक गए तो उन्होंने बाबा बंदा सिंह बहादुर 9 जून 1716 को कत्ल कर दिया। उनका कत्ल क़ुतुबमीनार के पास किया गया। कत्ल करने के बाद उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिएl
इतिहास के पन्नो में उनका नाम सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह के समय मे आता है l बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर के पुंछ में 27 अक्टूबर 1670 को हुआ था l वह शुरुआत में एक हिंदू राजपूत थे l उनका असली नाम लक्ष्मण देव भारद्वाज था l सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने नांदेड में इनको सिख बनाया और उनका नाम बंदा सिंह रख दिया l लक्ष्मण देव भारद्वाज ने 13 साल की उम्र में बैराग की दीक्षा ली और बैरागी संत बंदा बैरागी बनेl संत बनने के बाद वह घूमते घूमते महाराष्ट्र के नांदेड़ पहुंचे और गोदावरी नदी के किनारे अपना आश्रम बनायाl गुरु गोविंद सिंह जी के दो साहिबजादे को सरहिंद के नवाब ने जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया था इसके बाद गुरु गोविंद सिंह जी नांदेड़ गए l जब गुरु गोविंद सिंह जी उनके आश्रम में पहुंचे तो वह उनसे बहुत प्रभावित हुएl यहीं पर है गुरु गोविंद सिंह जी ने बंदा बैरागी को सिख धर्म की दीक्षा दी और बाबा बंदा सिंह बहादुर बनाया l यही से ही गुरु गोविंद सिंह जी ने बाबा बंदा को पंजाब जाने का आदेश दिया l गुरु गोविंद सिंह जी ने बंदा बहादुर को अपनी तलवार भी दी l
1709 में मुगलों ने गुरु गोविंद सिंह की हत्या कर दी इसके बाद गुरु गोविंद सिंह जी की दूसरी पत्नी माता सुंदरी को खालसा का मुखिया बनाया गया l 1709 में बाबा बंदा सिंह बहादुर सोनीपत के पास श्रीखंडा पहुंचे और 60000 सैनिकों के साथ फौज तैयार की l यह सेना मुगलों से लड़ी और सतलज यमुना के बीच का इलाका जीत लियाl इस जीत के साथ ही बंदा सिंह बहादुर सिखों के पहले राजा बने l इससे पहले जितने भी गुरु सिखों का नेतृत्व कर रहे थे वह गुरु थे ना कि कोई राजा की यद्यपि उनका सम्मान राजा महाराजा से भी बड़ा है और वह सभी सिखों के लिए भगवान के समान हैl इस जीत के साथ ही पूरे पंजाब के कबीलो में देग, तेग, फतेह बंदा बैरागी का नारा गुजने लगा ।
बाबा बंदा सिंह बैरागी ने मुगलों के उस तिलिस्म को भी तोड़ दिया जो यह सोचे थे कि उनको कोई हरा नहीं सकता इन्होंने मुगलों को एकदम से तबाह कर दिया। खालसा पंथ की नियमों और धर्मों के अनुसार सिख धर्म का विस्तार करने लगे। उन्होंने पंजाब और हरियाणा के कई इलाकों में मुस्लिमों द्वारा जाटों पर हो रहे जुल्म को खत्म किया। वैसे इससे पहले भी गुरु गोविंद सिंह जी ने सभी जाट को किसानी के साथ-साथ तलवारबाजी करने का भी संदेश दिया था और उनके संदेश से ही बड़ी संख्या में जाट लोग सिख धर्म में शामिल हुए। बाबा बंदा बहादुर जीने गुरु जी के इस उद्देश को और भी आगे बढ़ाया और बड़ी संख्या में जाटों को सिख धर्म में शामिल किया और उनको खेती छोड़कर लड़ने के लिए प्रोत्साहन किया। बंदा सिंह बहादुर की बढ़ती ताकत को देखकर मुगलों की सेना डरने लगी थी और मुगल सोचने लगे थे कि अगर इस बंदा बैरागी को रोका ना गया तो यह मुगल सल्तनत को खत्म कर देगा । मुगल बाबा बंदा सिंह बहादुर के कत्लेआम से डर चुके थे l बाबा बंदा सिंह बहादुर अपना कहर मुगलों पर इतना डाला था कि वह उनके नाम से भी डरते थे l इतना कत्लेआम मचा रखा था कि खुद सिख धर्म के कई लोगों ने उनको ऐसा करने से मना किया शायद यही वजह है कि वह आखरी समय में कुछ अकेले से पड़ गए थे क्योंकि कई सिखों ने उनका साथ छोड़ दिया था l सिखों ने उनको छोड़ा था या नहीं छोड़ा था इसका कोई सटीक प्रमाण नहीं है इसलिए इसमें कुछ कहना जल्दबाजी होगी l
बंदा बहादुर सिंह ने आगे बढ़ते हुए 1710 में सरहिंद को जीत लिया और सतलुज नदी के दक्षिण में सिख राज की स्थापना की। इसी युद्ध को ही इतिहास में छप्पड़ चिड़ी का युद्ध कहा जाता है । इसमें उन्होंने सरहिंद के नवाब को मार दिया l इस युद्ध के साथ ही बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोविंद सिंह जी के दो बड़े साहिबजादो की हत्या का भी बदला ले लिया। इसके बाद उन्होंने 6 गुरुओं के नाम से सिक्के भी चलाए। इसके बाद उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया और उत्तर पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक अपना राज कायम कर लिया।
बंदा बहादुर सिंह ने अपने शासनकाल में कई अच्छे और सामाजिक काम किया। उन्होंने प्राचीन जमीदारी प्रथा का अंत कर दिया और किसानों को बड़े-बड़े जागीरदारों और जमीदारों से छुटकारा दिलवाया। वह इंसानियत में विश्वास करते थे ना कि मुस्लिम सिख या हिंदू में। उनकी सेना में लगभग 5000 मुस्लिम थे और उन मुसलमानों को उनकी सेना में रहकर नमाज पढ़ने की और अपने धर्म का पूरा पालन करने की इजाजत थी। अगर कहीं हमला भी करते थे तो उसमें आम लोगों को नहीं मारते वह सिर्फ वहां पर राज करने वाले नवाबों को मारते थे। आमजन के दिल में बाबा बंदा बहादुर सिंह का बहुत आदर था।
इतने नेक और महान वीर पुरुष का अंत बहुत ही दुखदाई हुआ परंतु इतने दुखदाई अंत में भी उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। 1715 में बादशाह फर्रूखसियर की शाही फौज ने गुरदासपुर के गांव गुरदास नंगल गढ़ में इनकी फौज को कई मास तक घेरे रखा। मुगलों ने इस गढ़ को घेरे रखने के लिए लगभग 30,000 सेना को लगा दिया था उन्होंने इस गढ़ में किसी भी प्रकार के प्रवेश को बंद कर रखा था खाने पीने का सामान तो बहुत दूर की बात थी। मुगलिया सल्तनत यह जानती थी कि अगर सारे मिलकर बाबा बंदा सिंह बहादुर को ना रोक पाए तो यह इंसान मुगल सल्तनत को उखाड़ के फेंक देगा। इसलिए मुगलों ने गढ़ की किलेबंदी में पूरी ताकत झोंक दी थी। बाबा बंदा सिंह बहादुर के सिपाहियों ने भी इसमें बड़ा साहस दिखाया और लगातार कई महीनों तक वह अंदर ही रहे। जब उनको खाने का सामान खत्म हो गया तो वह घर के अंदर लगी घास और पत्तों को खाने लगे। अंत में वह भी खत्म हो गया। इसके बाद भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया परंतु बड़े साजिश और धोखे के साथ बाबा बंदा सिंह बहादुर को पकड़ लिया गया।फिर 17 दिसंबर 1715 को बंदा सिंह बहादुर समेत 740 सैनिकों को लोहे की जंजीर में जकड़ कर दिल्ली ले जाया गया। फिर 5 मार्च 1716 को इन कैदियों को कत्ल करने का काम मुगलों ने शुरू किया। लाल किले के पास हर रोज 100 सिखों को कत्ल किया गया। बाबा बंदा सिंह बहादुर को कत्ल करने से पहले बहुत ही क्रूर यातनाएं दी गई। उनको इस्लाम धर्म कबूल करने के लिए कहा गया।
पर वह तो बाबा बंदा सिंह बहादुर थे वाह इतने बहादुर थे कि उन्होंने कभी भी इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया। मुगलों ने अपनी क्रूरता का परिचय दीया। बाबा बंदा सिंह बहादुर को किलो वाले पहियों के बीच से गुजारा गया। उनके शरीर के मास को एक-एक करके नोचा गया। फिर भी उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया और बड़ी जोर के साथ इस्लाम धर्म को ललकारा। इतनी क्रूर यातनाओ के चलते वह बेहोश हो गए। जब उनको होश आया तो उनके सात साल के बच्चे को उनकी गोद में रख दिया गया। उनके सामने ही उनके बच्चे का कत्ल कर दिया गया और उनके बच्चे के कलेजे को उनके मुंह में डाल दिया गया। इसके बावजूद भी उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया। बाबा बंदा सिंह बहादुर की बहादुरी के आगे मुगलों के क्रूरता हार चुकी थी। अब मुगलों ने सोचा कि उनकी क्रूरता का बाबा बंदा सिंह बहादुर के ऊपर कोई भी असर नहीं हो रहा। अंत में जब मुग़ल थक गए तो उन्होंने बाबा बंदा सिंह बहादुर 9 जून 1716 को कत्ल कर दिया। उनका कत्ल क़ुतुबमीनार के पास किया गया। कत्ल करने के बाद उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिएl
पर जुल्म करने वाला हमेशा यह भूल जाता है सच्चाई कभी मरती नहीं और ना ही सच्चे इंसान के विचार कभी मरते हैं। आज के समय में मुगल की सल्तनत और उनके नाम इतिहास में दफन है परंतु बाबा बंदा सिंह बहादुर जैसे इंसान इंसानों के दिलों में आज भी जिंदा है। पंजाब सहित दिल्ली में कई जगहों पर उनके नाम से स्मारक रखे गए हैं। पहले इतिहासकार बाबा बंदा सिंह बहादुर के बारे में उतना नहीं जानते थे जितना आज जानते हैं इसलिए आज के समय में उनका महत्व भी काफी बढ़ गया है। आजकल इंटरनेट पर बाबा बंदा सिंह बहादुर के बारे में आप सभी लोगों को बहुत से आर्टिकल मिलेंगे कई आर्टिकल में तो उनको किसी विशेष धर्म या जाति से जोड़ के रखा गया है। पर जो भी लेखक अगर किसी भी सिख धर्म के अनुयाई या सिख धर्म के बारे में लिख रहे हैं तो वह यह जरूर याद रखें सिख धर्म के लोग किसी धर्म या जाति के नहीं। उनको किसी धर्म या जाति में ना रखें। महान सिख गुरुओं ने धर्म के ऊपर एक बात कही है जो खास करके सिखों के लिए हैं गुरुजी कहते हैं" सिख धर्म की कोई जात नहीं जिसकी जात है वह सीख नहीं "
बाबा बंदा सिंह बहादुर ,तोड़ा मुगल राज
Reviewed by ARJUN KUMAR
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June 11, 2021
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June 11, 2021
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