कौन है मनु?जाति व्यवस्था में इनकी भूमिका

       देश में महामारी का दौर चल रहा है, ऊपर से टिड्डी दल का हमला हो रहा है, इसी बीच भारी संख्या में लोग यह मांग करते हैं कि राजस्थान हाई कोर्ट के सामने लगी मनु की मूर्ति को हटाया जाए यह समानता और मानवता के खिलाफ है। पर  जो मनु के समर्थक हैं वह यह मांग कर रहे हैं कि मनु भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं तो उनकी मूर्ति क्यों हटाई जाए। तो यह मनु है कौन जिनके लिए कुछ लोग समर्थन कर रहे हैं और कुछ लोग विरोध कर रहे हैं। वैसे जो समाजशास्त्र के विद्यार्थी होंगे उनको इनके बारे में काफी पता होगा और जो ब्राह्मण कुल के होंगे उनको भी इनके बारे में पता होगा और कुछ लोगों को यूट्यूब पर या दूसरे सोशल मीडिया इनके बारे में जानते होंगे। जिन को नहीं पता है की  मनु कौन है और उनकी भारतीय  समाज में क्या महत्वपूर्ण भूमिका है वह इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें। क्योंकि मनु वह व्यक्ति हैं जिन्होंने भारतीय समाज की पूरी परंपरा को बदल कर  रख दी। भारत के संविधान से पहले महर्षि मनु द्वारा बनाया हुआ मनुस्मृति विधान ही भारत में चलता था।
                           मनु का जीवन परिचय 
               मनु के जीवन परिचय के बारे में सभी विद्वानों के विचार एकमत नहीं है। सभी विद्वान अलग-अलग सबूतों के द्वारा मनु के जीवन की अलग-अलग कल्पना करते हैं । ऐतिहासिक प्रमाणों और साहित्यिक तथ्यों के अनुसार महाभारत का रचनाकाल 3150 ईसा पूर्व का ग्रंथ माना जाता है । महाभारत में बार-बार  महाराजा मनु का नाम आता है, परंतु मनुस्मृति में ना तो कृष्ण ,ना वेद व्यास का ही नाम मिलता है  । इसी प्रकार रामायण में 4-18-30,31,32 मे मनुस्मृति श्लोक मिलते हैं और महाराजा मनु की चर्चा मिलती है, परंतु मनुस्मृति में राजा राम, महर्षि वाल्मीकि या रामायण की कोई चर्चा नहीं मिलती। सनातन धर्म के अनुसार मनु संसार के प्रथम पुरुष हैं। प्रथम मनु का नाम स्वयंभू मनु था जिसके संग प्रथम स्त्री थी शतरूपा। धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वयंभू का अर्थ होता है जिसका जन्म ना हुआ हो अर्थात मनु का जन्म बिना माता-पिता के हुआ इसलिए मनु स्वयंभू कहलाए। धर्म ग्रंथों के अनुसार मनु के  प्रथम संतानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई। मनु की संतान होने के कारण ही सामान्यतः मनुष्य या मानव कहलाए। ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं और एक कल्प में 14 मनु हो जाते हैं एक मनु के काल को मन्वंतर कहते हैं वर्तमान में वैवस्वत मनु हैं।यह सारी बातें धर्म ग्रंथों के अनुसार हैं जो मनु के बारे में कही गई हैं। इसलिए हिंदू धर्म को मानने वाले  मनु के प्रति अपार श्रद्धा प्रकट करते हैं। 
मनु की रचना मनुस्मृति जिसने भारतीय समाज को वर्ण (जाती)व्यवस्था में बदल दिया 
       मनु द्वारा मनुस्मृति नामक पुस्तक की रचना से पहले भारत में जाति व्यवस्था सिर्फ नाम मात्र की थी। वह इतनी कठोर नहीं थी। इस पुस्तक से पहले औरतों को भी बहुत आदर भाव से देखा जाता था। समाज में औरतों की जगह काफी ऊंची समझी जाती  थी। मनुस्मृति की रचनाकार के मनु हमेशा के लिए अमर हो गये। इस पुस्तक से इनको बहुत बड़ी पहचान मिली जिसके लिए आज भी ईनके समर्थक इनको पूजते हैं।  मनुस्मृति के अनुसार ब्रह्मा के शरीर से 4 जातियां निकली हैं। ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, ब्रह्मा के भुजा से छत्रिय, ब्रह्मा के जांघों से वैश्य और ब्रह्मा के पैरों से शूद्र (sc.st.obc)निकले हैं।

इसके अनुसार ब्राम्हण ज्ञान का दाता होगा , क्षत्रिय वीर योद्धा होगा , वैश्य व्यापार करेगा, बाकी सारे काम शूद्र करेगा। यानी इनके अनुसार शूद्र इन तीनों वणो की सेवा करेगा। पर यह वर्ण व्यवस्था  काम के आधार पर थी ना की जाति के आधार परंतु  इसी वर्ण व्यवस्था ने  आगे जाकर  कठोर जाति व्यवस्था को  जन्म दिया । जिससे  भारतीय समाज  पूरी तरह बदल गया ।यह पुस्तक औरतों के बारे में भी कहती है कि औरतों को ज्ञान पाने  का कोई अधिकार नहीं है, औरत को केवल घर का कामकाज और पुरुष की सेवा करनी चाहिए। यह पुस्तक यह भी कहती है कि शुद्र और औरतों को पढ़ाई का कोई अधिकार नहीं है। इसके अलावा यह पुस्तक समाज में कानूनी व्यवस्था की भी बात करती है। पुस्तक यह भी बताती है कि राज व्यवस्था कैसी होनी चाहिए कैसे किसी को दंड देना चाहिए।इसी बात को लेकर लोग राजस्थान हाई कोर्ट के सामने लगी मनु की मूर्ति का विरोध करते हैं और उसको हटाने की मांग कर रहे हैं। क्योंकि जो लोग विरोध कर रहेे हैं इनका मानना यह है कि मनु मानवता और एकता के खिलाफ हैं, ऐसे व्यक्ति की मूर्ति एक न्याय मंदिर के सामने कैसे लगाई जा सकती है जो न्याय मंदिर भारतीय संविधान के अनुसार काम करता है।
                            अब यही बात दो समाज के बीच टकराव का काम भी  कर देती है । यह एक समाज को अधिक अधिकार देती है और दूसरे को ना के बराबर। इस पुस्तक में जिसके पक्ष की बात की गई है अधिकारों की बात की गई है वह मनु को बहुत मानते हैं और उनकी कही गई बात को परमेश्वर की बात मानते हैं। वही दूसरा वर्ग इस पुस्तक को और मनु को अपने लिए अच्छा नहीं समझते इसलिए हमेशा इसका विरोध करते हैं। इसलिए जब मनु की मूर्ति को राजस्थान हाई कोर्ट के सामने लगाई गई तो भारी संख्या में लोगों ने उसका विरोध किया यह बात अलग है कि इसको मुख्य मीडिया में नहीं दिखाया गया। मनुस्मृति का समर्थन करने वाले यह कहते हैं कि मनु ने कोई जाति नहीं बनाई और मनुस्मृति का जो समर्थन नहीं करता वह कहता है कि मनु ने  ही जातियां बनाई। क्या सही और क्या गलत उसको जानने के लिए दोनों पक्षों का जानना अति आवश्यक है इसलिए हम इसके समर्थकों और विरोधियों के दोनों विचार देखते हैं।
    
              -:  मनुस्मृति के समर्थकों के   विचार :-
1. यह भारत की पौराणिक न्याय व्यवस्था है:- इनके समर्थकों कहना है कि यह भारत की प्राचीन और पौराणिक न्याय व्यवस्था है ।यह किसी प्रकार से गलत नहीं हो सकती और ना ही किसी के साथ अन्याय कर सकती है। इसको मानने वालों में r.s.s. जैसी बड़ी संस्थाएं भी है। 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ तब r.s.s. के प्रमुखों ने यह कह कर इसका विरोध किया कि भारत में पहले से ही न्याय व्यवस्था और संविधान हैं मनु व्यवस्था। इसलिए उन्होंने 52 साल  तक ना तो संविधान को मान्यता दी और ना ही अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराया। जैसी समय बदला वैसे ही उन्होंने भी राजनीति के लिए उनको अपना लिया। ऐसा विद्वानों द्वारा कहा जाता है।
2. यह दुनिया के प्रथम पुरुष ने लिखी है इसलिए यह सर्वोपरि है:- जैसा कि धर्म ग्रंथों से पता चलता है कि मनु इस दुनिया के प्रथम पुरुष थे इसलिए उनके मानने वालों में यह बड़ी आस्था है कि उनकी कोई भी रचना खराब नहीं हो सकती और ना समाज विरोधी।
3. इसमें औरतों, शूद्रों का अपमान नहीं किया गया है उनको बराबर का अधिकार दिया गया है-: मनुस्मृति के समर्थकों का मानना है कि इसमें औरतों,शूद्रों  का अपमान नहीं किया गया है और उनको सारे अधिकार दिए गए हैं। वह कहते हैं कि जो लोग कहते हैं कि यह पुस्तक औरत और शूद्र विरोधी है वह लोग गलत धारणा रखते हैं उनको असली मनुस्मृति का पता ही नहीं।
4. जाति व्यवस्था मनु ने नहीं बनाई:- इसके समर्थक कहते हैं कि भारत में जाति व्यवस्था मनु ने नहीं बनाई है। मनु ने  तो सिर्फ काम के आधार पर वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया। उन्होंने जो भी लिखा वह वेदों पर आधारित था ना कि उनकी खुद की सोच। इसलिए मनु को जाति व्यवस्था का दोषी नहीं माना जा सकता।
5. मनुष्य कर्म के आधार पर ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनता है जन्म से नहीं:- इनके समर्थक कहते हैं कि मनुस्मृति में यह साफ-साफ लिखा है कि शूद्र कोई भी हो सकता है ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य इनमें से कोई भी। क्योंकि यह नाम आपको आपके कामों के अनुसार दिया गया है ना कि जन्म के आधार पर। इसलिए कर्मों के हिसाब से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र  बन सकता है।
6. यह भारतीय सभ्य समाज की आधारशिला है:- मनु के समर्थकों का मानना है कि मनुस्मृति भारतीय सभ्य समाज की आधारशिला है ।उनका मत है कि मनुस्मृति से पहले भारत में सामाजिक व्यवस्था नहीं थी। इसने ही भारतीय समाज को एक सभ्य समाज बनाया।
7. यह भारत की न्याय व्यवस्था की प्राचीन प्रणाली है:- मनु समिति के समर्थकों का मानना है कि भारत में जो भी न्याय व्यवस्था है वह इसी कारण है। राजा राज कैसे करेगा ,किसको कितनी सजा मिलेगी ,यह सब मनुस्मृति बताता  है।
8. पूरी दुनिया में ऐसी पुस्तक नहीं है:- मनु के समर्थकों का मानना है कि मनुस्मृति जैसी पुस्तक पूरी दुनिया में नहीं है, यह बात इसको और भी महान बना देती है क्योंकि इसकी जैसी पुस्तक पूरे विश्व में नहीं है। उनके समर्थकों का इसलिए मानना है कि इसका सम्मान होना चाहिए और भारत की राजव्यवस्था इसी पर काम करनी चाहिए ना कि संविधान पर। वे मानते हैं कि जो भारतीय संविधान है वह पश्चिमी देशों के विचारों पर आधारित है इसलिए यह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है।
9. मनुस्मृति अच्छी थी अंग्रेजों ने तो गलत बनाया:- मनु के समर्थक यह मानते हैं कि इसमें जो भी जाति व्यवस्था या नारी के अधिकारों का हनन है या शूद्रों को सेवा करने तक सीमित रखना,  यह सब बातें असली मनुस्मृति में नहीं लिखी गई थी। बल्कि सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति के तहत मनुस्मृति में जाति व्यवस्था जोड़ दी और इसमें महिलाओं और शूद्रों के अधिकारों का हनन भी जोड़ दिया। इस में मनु की कोई गलती नहीं है क्योंकि मनु ने जो किताब लिखी थी वह तो सभी के अधिकारों की बात करते थी।
                                          
                  -: मनुस्मृति के विरोधियों के विचार :-
1 इसने भारत में जाति व्यवस्था को जन्म दिया:- मनुस्मृति की विरोधी यह मानते हैं कि इस पुस्तक ने भारत में जातिवाद को जन्म दिया। ऐसी व्यवस्था जिसने इंसानों से भेदभाव करना शुरू किया। मनुष्य के सामने ही कुछ मनुष्यों को इसने जानवर बना कर रख दिया। ऐसी कठोर जाति व्यवस्था बनी की जो आज तक टूट नहीं पाई है बेशक इंसान आज चांद पर पहुंच गया है।
2.  अगर मनु ने औरतों और शूद्रों को बराबर का अधिकार दिया होता तो आज उनकी दशा ऐसी  क्यों:- मनुस्मृति के विरोधी यह मानते हैं कि यह शुद्र और औरतों के अधिकारों का गला घोटती हैं। वह औरतों को केवल भोग की वस्तु समझते थे और शूद्रों को अपना गुलाम समझते थे। इन दोनों के साथ कई प्रकार के भेदभाव किए जाते थे। जो लोग यह कहते हैं कि मनुस्मृति औरतो और शूद्रों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करती तो वह लोग यहां बताएं आखिर क्या हुआ जो एक ही धर्म के लोग अपने ही लोगों को जानवर से भी बदतर समझने लगे और जिस औरत की देवी के रूप में पूजा होती है उसी औरत को भोग की वस्तु समझने लगे।
3. एक सभ्य भारतीय समाज को इस ने नष्ट कर दिया:- मनुस्मृति की विरोधी कहते हैं कि मनुस्मृति आने से पहले भारत में एक सभ्य सभ्यता थी। इस सभ्यता में कोई जाति पात का बोलबाला नहीं था। सब समान रूप से अपना काम करते थे औरतों की बड़ी इज्जत की जाती थी। उनका सम्मान पुरुषों से ऊपर होता था। पर मनु सभ्यता ने पुरानी सभ्यता को नष्ट कर दिया।
4. मनुस्मृति को मानना आर्यों की सभ्यता है भारतीयों की नहीं:- इसके विरोधी 
 यह मानते हैं कि जिनको भारतीय समाज में आज छोटी जाति का समझा जाता है वह भारत के मूल निवासी हैं और जो अपने आप को ऊंची जाति कहते हैं वह विदेशी हैं। मनुस्मृति के विरोधी कहते हैं कि मनु बाहर से आए आर्य थे इसलिए उनकी यह पुस्तक उनके आर्य लोगों पर ही लागू होती है भारत के मूल निवासियों पर नहीं।
5. यह भारत की एकता को कमजोर करती है:- मनुस्मृति के विरोधी कहते हैं कि कुछ वर्गों को विशेष अधिकार देकर अन्य वर्गों के अधिकारों को छीन कर यह भारतीए एकता को कमजोर करती है। क्योंकि वणो में व्यवस्थित लोग केवल अपने ही वणो के  बारे में अधिक सोचते हैं जिसे वह राष्ट्रहित के बारे में सोच नहीं पाते।
6. यह ब्राह्मणों की वर्चस्व की पोशक है:- मनुस्मृति के विरोधियों का मानना है कि इस पुस्तक का के  अनुसार    ब्राह्मण ज्ञान का दाता है। इसलिए सभी जातियों में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है, सभी जातियों मे ब्राह्मण ही ऐसा व्यक्ति है जिसकी पूजा होती है। भगवान की पूजा केवल ब्राह्मण ही करवा सकता है और किसी को इसका अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर यह ब्राह्मणों को सर्वोपरि बना देता है।
7. वर्तमान में यह भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है:- मनुस्मृति के विरोधियों का मानना है कि भारत का संविधान सभी को एकता और समानता का अधिकार देता है। परंतु इस पुस्तक के अनुसार समानता और एकता दोनों ही प्रभावित होते हैं। इसलिए वर्तमान में यह संविधान के मूल भावना के खिलाफ है।
8. यह लोकतंत्र की समर्थक नहीं है:- मनुस्मृति विरोधियों का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसमें सभी की हिस्सेदारी है। लोकतंत्र में सबको साथ लेकर चला जाता है और सब के बारे में सोचा जाता है। परंतु यह पुस्तक सबको साथ लेकर चलने की बात नहीं करती जिससे वर्तमान समय में यह लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। 
9. मानव के अधिकारों का गला घोटने वाली पुस्तक:- इसके विरोधी कहते हैं कि वर्तमान समय में पूरे विश्व में मानव के अधिकारों का ख्याल रखा जाता है। बेशक वह चोर हो या कोई कातिल कानून उसको भी अधिकार देता है जो एक मानव को मिलना ही चाहिए। ऐसे समय में जब मानव के अधिकार बहुत ही मूल्यवान हो जाते हैं तो कोई कैसे यह स्वीकार कर सकता है कि उसके अधिकारों को छीना जाए। पर यह पुस्तक मानव के अधिकारों का गला घोटती  है।
      अगर आपने दोनों पक्षों को पढ़ लिया है तो आप अच्छी तरह समझ सकते हैं की यह पुस्तक वर्तमान समय के लिए उचित है या अनुचित है ।इसका मूल्यांकन आप स्वयं कर सकते हैं।  
  
           -: मनुस्मृति को लेकर इतिहास में हुए विवाद :-
जैसा कि यह पुस्तक औरतो और शूद्रों के खिलाफ है। यह पुस्तक मानवता भावना के  भी खिलाफ है। इसलिए 25 दिसंबर 1927 को भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ मिलकर इस पुस्तक को जलाया और उन्होंने लोगों को नारा दिया कि यह पुस्तक इंसान को इंसान से नफरत करना सिखाती है इसलिए इसको जलाना ही सही है। यह पुस्तक जातिवाद को बढ़ावा देती है इसलिए इसको जला दो। उसके बाद जो अंबेडकर को मानते हैं वह हर साल 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस मनाते हैं। अंबेडकर के मानने वालों का यह भी कहना है कि अंबेडकर एक महामानव और विद्वान थे तो उन्होंने जो फैसला लिया वह गलत कैसे हो सकता है और वैसे भी अगर यह फैसला गलत होता तो आज भारतीय समाज ऐसा क्यों होता। यानी कुछ तो गड़बड़ी हुई है इसलिए भारतीय समाज में आज भी भेदभाव जारी है। वर्तमान में भी कई बार इस पुस्तक को लेकर विवाद होते रहते हैं खासकर इसके समर्थकों और विरोधियों के बीच में। कुछ लोग तो आज भी  मांग करते हैं कि संविधान को हटाकर मनु विधान लागू किया जाए। जिन लोगों की हिंदू धर्म और उनके धर्म ग्रंथों में असीम आस्था है वह अक्सर संविधान का विरोध करते हैं।

                    निष्कर्ष:- अब आप अच्छी तरीके से समझ गए होंगे कि  कुछ लोग  मनु की मूर्ति का विरोध क्यों कर रहे हैं  और क्यों वह  राजस्थान हाई कोर्ट से  उसको हटाने की बात कर रहे हैं ।मनुस्मृति के समर्थक और विरोधियों के विचारों को जानने के बाद निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऐसी कोई भी वस्तु जो समाज को आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करें या तो उसको बदला जाए या उसको हटाना ही अच्छा होगा। मनुस्मृति का विधान जब था तब था हजारों वर्षों से चलता आ रहा था परंतु समाज  परिवर्तनशील होता है इसलिए इसमें निरंतर बदलाव होते रहना चाहिए। यह बदलाव मानव के मूल्यों पर आधारित होना चाहिए जो उसको जीने का, रहने का, बिना भेदभाव जीवन यापन का अधिकार दिया गया है वह कायम रहना चाहिए। हमें उस पुस्तक ,उस सोच की अधिक आवश्यकता है जो हम सबको एकता के एक धागे में बांध के रखे जिससे हमारे देश की एकता मजबूत हो ना कि ऐसी कोई चीज जो हमारी एकता को कमजोर करें। बेशक इसके समर्थक यह मानते हैं कि मनुस्मृति में जातिवाद  औरतों का शोषण की ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई है, इसको गलत ढंग से पेश किया गया है ताकि भारतीय समाज में फूट पड़े और अंग्रेज इसका फायदा उठाएं परंतु यह अंग्रेज तो बाद में आए हैं पर वर्ण व्यवस्था तो  हजारों साल से चलती आ रही हैं। क्या कोई जवाब देगा इसको कौन चला रहा  था। किस आधार पर भारत में इतनी कठोर जाति व्यवस्था लागू हो गई जिसने आज तक हमारे देश को बार-बार जख्म दिया है और हमारी एकता को कमजोर करने की कोशिश की है। तो उचित यही होगा ऐसी व्यवस्था से अच्छा है वर्तमान में हमारा भारतीय संविधान जो सभी को समानता ,एकता का अधिकार देता है और वह शोषित वंचित वर्गों का भी ख्याल रखता है।
       
कौन है मनु?जाति व्यवस्था में इनकी भूमिका कौन है मनु?जाति व्यवस्था में इनकी भूमिका Reviewed by ARJUN KUMAR on July 07, 2020 Rating: 5

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