भतरा आदिवासी और चींटी से मलेरिया का इलाज

भतरा आदिवासी यह भारत की आदिवासियों में से एक आदिवासी जनजाति है जोकि मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ ,उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश में रहती है। देश में इनकी आबादी लगभग तीन लाख है। इनकी भाषा भतरी है।
खेती पर निर्भरता इनकी कम होती है इनकी सबसे ज्यादा निर्भरता जंगलों पर रहती है। कुछ आदिवासी इसमें से खेती भी करते हैं परंतु आधुनिक खेती से अभी यह काफी दूर हैं।
              जंगलों पर अधिक निर्भरता होने के कारण इनके  खानपान और स्वास्थ्य संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए यह जंगल की जड़ी बूटियों और जानवरों पर निर्भर रहते हैं। इस आदिवासी समुदाय में एक अनोखे तरीके से मलेरिया का इलाज किया जाता है।

     भतरा आदिवासी इन चीटियों को चापड़ा कहते हैं
ऊपर तस्वीर में आप जिन चीटियों को देख रहे हैं  भतरा आदिवासी इन चीटियों को जिस रोगी को मलेरिया हुआ है उस रोगी के ऊपर पेड़ से उतारकर सीधे ही छोड़ देते हैं सावधानी के लिए वह बस इतना करते हैं कि रोगी के कानों में रुई डाल देते हैं ताकि  चीटियां उसके कान में प्रवेश ना कर पाए इसके बाद वह रोगी को वैसे ही छोड़ देते हैं चीटियों को काटने के लिए। चीटियों के काटने से बहुत ज्यादा जलन तकलीफ और शरीर पर निशान पड़ जाते हैं परंतु इससे मलेरिया  ठीक भी हो जाता है। यह बेशक वर्तमान समय में सुनने में अजीब और पागलपन सा लगे परंतु यह आदिवासी समुदाय सदियों से इसके द्वारा अपने रोगों का उपचार कर रहा है।

 चिट्टियां भोजन के रूप में:- भतरा आदिवासी इन चीटियों को भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं । वहीं को बड़ी संख्या में पकड़ कर एक टोकरी में ले जाते हैं और इसके बाद इन चीटियों को धोकर इनका प्रयोग करते हैं, जैसे इन चीटियों से वह  चटनी , सब्जी, पकोड़े  आदी बनाते हैं ।
         आप लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि यह लोग चीटियों को खाते हैं पर यह सत्य है और इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि यह उनकी परंपरा का हिस्सा है। पर जैसे-जैसे यह आधुनिक समाज में जुड़ते जाएंगे वैसे वैसे वह ऐसी परंपराओं से दूर भी होते जाएंगे। अभी तक बहुत ही कम आदिवासी आदमी शिक्षा से जुड़े हैं सरकार इसमें अपना पूरा सहयोग दे रही है परंतु अभी भी काफी समय लगेगा इस समुदाय को बदलने में।

भतरा आदिवासी और चींटी से मलेरिया का इलाज भतरा आदिवासी और चींटी से मलेरिया का इलाज Reviewed by ARJUN KUMAR on June 04, 2020 Rating: 5

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