- काला पानी का मानचित्र-
ताजा विवाद काला पानी को लेकर है। भारत सरकार ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए उत्तराखंड में धारचूला से लेकर लिपुलेख दर्रा तक एक सड़क का निर्माण किया। जैसे ही इस सड़क का उद्घाटन हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया तुरंत इसके बाद ही नेपाल सरकार ने इस पर आपत्ति जाहिर की और यह कहा कि काला पानी नेपाल के हिस्से में आता है। बस इसी को लेकर दोनों देशों में रस्साकशी चल रही है। पर काला पानी पर दोनों देशों का दावा कितना सच्चा और झूठा है इसको जानने के लिए हमें इतिहास को जानना बहुत जरूरी है क्योंकि इसका जवाब इतिहास के पन्नों में ही छुपा है तो चलिए जानते हैं कालापानी के इतिहास को।
1816 में सुगौली संधि से पहले नेपाली राजा का विस्तार सतलुज नदी तक था। नेपाली राजा अपना विस्तार और करना चाहते थे इसलिए वह बार-बार भारत के क्षेत्रों पर आक्रमण करते थे। उस समय भारत पर अंग्रेजों का राज्य था अर्थात अंग्रेजों और नेपाली राजाओं के बीच लड़ाईया होती रही।1816 आखिरकार अंग्रेजों ने नेपाली राजा को हरा दिया और उसी समय नेपाल और भारत के बीच सुगौली संधि हुई। सुगौली संधि के अनुसार काला पानी के पश्चिम के क्षेत्रफल मे नेपाल का कोई अधिकार नहीं होगा। अर्थात कालापानी नेपाल और भारत के बीच सीमा निर्धारित हो गई। काला पानी दोनों देशो के बीच बॉर्डर बन गई। सुगौली संधि में यह भी लिखा हुआ था कि यह संधि नेपाल के आने वाली राजाओं और उसके उत्तर अधिकारियों पर भी लागू होगी।
इसके बाद भारत में 1857 का विद्रोह होता है। इसको भारत के इतिहास में पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। उस समय नेपाल के राजा जंग बहादुर राणा थे। इन्होंने अंग्रेजों की इस 1857 के विद्रोह में मदद की। अंग्रेजों ने जल्दी ही इस विद्रोह को शांत कर दिया। नेपाल की इस मदद से अंग्रेज बहुत खुश हुए। उन्होंने नेपाल की मदद के बदले कुछ भारतीय क्षेत्रों को नेपाल को वापस कर दिया। इन क्षेत्रों में नेपालगंज, कपिलवस्तु शामिल थे। पर अंग्रेजों ने गढ़वाल कुमाऊं और काला पानी का क्षेत्र नेपाल को वापस नहीं किया था। क्योंकि काला पानी के पास लिपुलेख दर्रा का प्रयोग अंग्रेज चीन और तिब्बत के साथ व्यापार करने के लिए करते थे। काला पानी का भारत में होने का दूसरा सबूत यह है कि सर्वे ऑफ इंडिया जिसका काम सिर्फ मानचित्र बनाना था इसकी स्थापना अंग्रेजी साम्राज्य में हुई थी। सर्वे ऑफ इंडिया ने 1870 से लेकर अब तक लिपुलेख दर्रा और काला पानी के क्षेत्र को भारत के क्षेत्र में दिखाया है। नेपाल में कुछ समय के लिए राणा और फिर नेपाली राजा का राज्य हुआ पर अब तक किसी ने भी काला पानी को अपना हिस्सा नहीं कहा।
फिर 1954 में चाइना और भारत के साथ व्यापारिक समझौता हुआ उसमें भी लिपुलेख दर्रा शामिल था।2015 में इस व्यापारिक समझौते को अधिसूचित किया गया था । फिर 1981 में चाइना ने लिपुलेख दर्रा को कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए खोल दिया था। तब से इस मार्ग का प्रयोग कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए किया जाता है तब भी नेपाल ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
धारचूला से कैलाश मानसरोवर तक का नक्शा
अब आप समझ गए होंगे कि कि भारत और नेपाल में कौन कितना सच बोल रहा है। इस ताजा विवाद के पीछे चाइना का हाथ होने की पूरी संभावना है क्योंकि नेपाल आजकल चाइना के ज्यादा करीब जा रहा है इसके कई सबूत हैं जो इस प्रकार हैं।
नेपाल का चाइना के करीब जाने की प्रमाणिक सबूत
चाइना और नेपाल दोनों में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है:-
वर्तमान समय में नेपाल में जो के पी शर्मा ओली की सरकार है वह कम्युनिस्ट पार्टी की है। चाइना मे सबको पता है कि एक ही पार्टी है कम्युनिस्ट पार्टी इसलिए दोनों देशों की पार्टियों की सोच एक है और काफी मिलती-जुलती है। इसलिए नेपाल चाइना के करीब है।
केपी शर्मा ओली की सरकार को चाइना ने गिरने से बचाया:- अभी कुछ महीने पहले की ही बात है कि नेपाल की वर्तमान सरकार ने अपना बहुमत खो दिया था। केपी शर्मा ओली की सरकार नेपाल में गिरने ही वाली थी कि अचानक ही चाइना के राजदूत ने नेपाल की राजनीतिक पार्टियों से बात की और यह कहा कि इस सरकार को गिरने ना दें क्योंकि चाइना इसका समर्थक है। जिसे सरकार गिरने से बच गई इससे यह साबित होता है कि अब चाइना सीधे नेपाल के राजनीतिक क्षेत्र में भी हस्तक्षेप कर रहा है और नेपाल सरकार को चला रहा है।
नेपाल में चाइनीस भाषा अनिवार्य कर दी गई है:- नेपाल ने चाइना के साथ अपनी दोस्ती निभाते हुए और भारत को दूर करते हुए नेपाल में चाइनीस भाषा को अनिवार्य कर दिया गया। अर्थात जिस देश के बच्चे शुरू से ही किसी एक भाषा को पढ़ेंगे तो वह उसके करीब और जल्दी जाएंगे।
करोड़ों डॉलर का नेपाल में चाइना के द्वारा निवेश:- चाइना ने नेपाल में विकास के नाम पर करोड़ो डॉलर का निवेश किया है। कई बड़ी बड़ी परियोजनाएं चाइना ने नेपाल में शुरू किया है। यह चीज भी नेपाल को चाइना के करीब ले गई है।
इससे यह साफ जाहिर होता है कि इन सबके पीछे चाइना का हाथ है ।इसके अलावा नेपाल के लोगों में भारत के प्रति नफरत पैदा की जा रही है यह नफरत सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक फैलाई जा रही है।
काला पानी को लेकर नेपाल में प्रदर्शन
यूट्यूब पर भारत के खिलाफ प्रदर्शन
दोनों देशों के बिगड़ते रिश्तो से यह भी मालूम होता है कि भारत की वर्तमान सरकार वे नेपाल से सही रिश्ते कायम करने में विफल रही। यह भारत की कूटनीतिक विफलता भी है नेपाल चाइना के साथ है। हमारे पास अभी भी मौका है हमें वार्तालाप करके इस समस्या का समाधान कर लेना चाहिए। नेपाल के साथ लगते सीमाओं का हमारा लगभग 98% मुद्दों का हल हो चुका है बस 2% रह गए हैं इसका भी अगर हल कर ले तो आने वाले भविष्य के लिए अच्छा होगा और यह नेपाल के लिए भी अच्छा होगा कि वह भारत के साथ अपने रिश्ते अच्छे करें वरना वह भी श्रीलंका, पाकिस्तान की तरह चाइना के कर्ज के जाल में फंस जा जायेगा।
( जानकारी अच्छी लगे तो शेयर करें कमेंट करें और मुझे फॉलो करें धन्यवाद)
काला पानी का इतिहास,नेपाल मित्र से शत्रु कैसे...
Reviewed by ARJUN KUMAR
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June 01, 2020
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June 01, 2020
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