भारत में जाति आधारित रेजिमेंट का इतिहास....

भारत में अभी हाल ही में ताजा मुद्दा भारतीय सेना में जाति आधारित रेजिमेंट से है। काफी संस्थाओं और राजनेताओं ने इसकी मांग की है कि विभिन्न जातीय समुदाय के नाम पर भारत में जाति  आधारित  रेजीमेंट बनाया जाए या जो पुरानी रेजिमेंट है जाति व्यवस्था के आधार पर उसको खत्म किया जाए। बिहार में कुछ ही समय बाद चुनाव होने वाला है  इसलिए यह मुद्दा और भी छाया हुआ है  ।2019 के चुनाव में  उत्तर प्रदेश मे अखिलेश यादव ने यह घोषणा की थी कि यदि उनकी सरकार बनती है तो वह अहीर रेजिमेंट की स्थापना करेंगे।  सवाल यह है कि भारत में जाति व्यवस्था बड़ी ही जटिल है और इतनी जटिल है कि इसके नाम पे कई दंगे और जातीय हिंसा होते रहते हैं फिर भी उस देश की सेना में जाति आधारित रेजीमेंट रखना कितना उचित है। किसी भी विषय के बारे में कहने से पहले हमें उसके इतिहास के बारे में जानकारी अवश्य होनी चाहिए इसलिए हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि भारत में जाति आधारित रेजिमेंट कहां से शुरू हुआ तो चलिए जानते हैं इस इतिहास के बारे में।
जाति आधारित रेजिमेंट का इतिहास:- जब विदेशी भारत में व्यापार करने आए थे तो उनके पास अपनी सेना होती थी फिर जब उन्होंने भारत पर अपना पूरा कबजा कर लिया तब भी वह अपनी सेना इंग्लैंड से बुलाते थे परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी को काफी नुकसान होता था क्योंकि इंग्लैंड से बुलाने पर सेना को काफी ऊंचा वेतन देना पड़ता था ।इसलिए उन्होंने इसका हल यह निकाला की भारत वासियों को सेना में शामिल किया जाए जिससे उनकी लागत भी कम होगी और काफी पैसा बचेगा इस सोच के साथ उन्होंने भारतीयों को सेना में शामिल करना शुरू किया।
     भारतीय अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल होते गए और कुछ समय तक ऐसा चलता रहा पर अचानक  एक बदलाव आया।1857 का विद्रोह हुआ और इस विद्रोह में अंग्रेजों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारतीयों को किस हद तक सेना में शामिल किया जाए। उन्होंने यहां सोचा कि जो जातियों लड़ाकू है और जो जातियां लड़ाकू नहीं है उनको अलग अलग किया जाए सिर्फ लड़ाकू जातियों को ही सेना में शामिल किया जाए क्योंकि अंग्रेज़ों कि यह सोच थी कि जातियां  लड़ाकू होती हैं कोई व्यक्ति लड़ाकू नहीं होता।
    1857 के विद्रोह में सबसे बड़ी भूमिका बंगाल की सेना ने निभाई थी। इसलिए अंग्रेजों ने सोचा की सिर्फ एक प्रांत से सेना में लोगों को भर्ती ना किया जाए बल्कि सभी प्रांतों से भर्ती किया जाए कि यदि एक प्रांत के लोग विद्रोह करेंगे तो दूसरे प्रांत के लोगों का प्रयोग उनके खिलाफ किया जा सकेगा। इससे पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सबसे ज्यादा बंगाल की सेना ही थी। इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने उन राज्यों की  सेना को कम कर दिया जिन्होंने इस विद्रोह को शुरू किया था।
     इसके ठीक उलट जिन राज्यों ने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों का साथ दिया था उन राज्यों की सेना को अधिक संख्या में ब्रिटिश इंडिया कंपनी में शामिल किया गया। अंग्रेजों का साथ देने वाली सेनाये थी नेपाल की सेना गोरखा ,पंजाब ,डोगरा ,राजपूत । 
         इन्हीं जातियों के आधार पर अंग्रेजों ने उन जातियों को खोजना शुरू कर दिया जो उनकी नजर में लड़ाकू थी। पर भारत देश में बहुत अधिक जातियां थी यह काम उतना आसान नहीं था ।इसीलिए अंग्रेजों ने जोनाथन पील कमिशन की स्थापना की इस कमीशन का काम यही था कि वह भारत में जितनी भी लड़ाकू जातियां हैं या समुदाय हैं उनको खोजें और अंग्रेजों की सेना में शामिल करें ।यह खोज इस आधार पर भी होनी चाहिए थी  कि वह भविष्य में अंग्रेजों के वफादार बने रहें। इसी के आधार पर बड़ी संख्या में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी में भारतीय सेना की भर्ती होने लगी।
          जोनाथन पील कमिशन की सिफारिश पर पहली जाति रेजिमेंट बनी:- राजपूत, गोरखा,डोगरा ,पठान , सिख और मुसलमान। भारत में वर्तमान समय में मुसलमान रेजिमेंट को छोड़कर बाकी सभी रेजिमेंट अभी भी है। इस प्रकार की रेजिमेंट हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी हैं।
       पर बेईमानी का दूसरा रूप अंग्रेज होता है, वह बहुत ही चालाक थे। जो जातियां लड़ाकू नहीं थी उन्होंने समय-समय पर उनको भी अपनी सेना में शामिल किया और उनके नाम से रेजिमेंट बनाई ।उदाहरण के लिए ब्राह्मण रेजिमेंट यह रेजिमेंट प्रथम विश्व युद्ध के समय अंग्रेजों ने बनाई। 1903 में इस रेजिमेंट को खत्म कर दिया गया प्रथम विश्व युद्ध के बाद। फिर दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने चमार रेजिमेंट की स्थापना की।  पर यह रेजिमेंट  सुभाष चंद्र बोस जी के स्वतंत्र सेनानी सेना में शामिल हो गई। यह बात अंग्रेजों को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने 1946 दिसंबर में इस सेना को खत्म कर दिया।
    1947 में भारत आजाद हुआ उसके बावजूद भी यह जाति आधारित रेजीमेंट भारतीय सेना में बनी रही। इस जाति आधारित  रेजीमेंट पर विचार करने के लिए चार बार कमेटियों का निर्माण किया गया। चारों ही बाहर चारों कमेटियों ने यही सुझाव दिया कि यह जाति आधारित रेजिमेंट जारी रहनी चाहिए जिसे सरकार ने भी इसको अब तक जारी रखा है। यहां तक जब सेना की भर्ती होती है तो जाति आधारित पर होती है। हालांकि यह नियम सिर्फ पैदल सेना में है बाकी अन्य सेनाओं में ऐसा कोई नियम नहीं है जो जाति आधारित हो।

वर्तमान सरकार की इस पर राय:- 2016 में संसद में पूछा गया था कि या जातीय भाई रेजिमेंट खत्म की जाए या बनी रहनी चाहिए इस पर उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि "सरकार इसको जारी रखने के पक्ष में है क्योंकि इससे सैनिकों में एकता बनी रहती है और इनकी लड़ाई लड़ने की क्षमता में भी वृद्धि होती है जिसका परिणाम हमने समय-समय पर देखा है हमारी सेनाएं हमेशा विजयी रहीं हैं"। अभी मार्च 2020 में एक आरटीआई के द्वारा केंद्र सरकार से सवाल पूछा गया था जाति आधारित  रेजीमेंट के बारे में  उस समय भी सरकार ने रक्षा मंत्री मनोहर पारिकर वाला ही बयान दिया। सरकार ने यह भी कहा कि वह उन्हीं जाति आधारित रेजिमेंट को जारी रखनाा चाहती जो पहले से हैं। आजादी से लेकर अब तक कोई भी जाति आधारित रेजिमेंट नही बनी है। 

 राष्ट्रपति की खास सेना भी जाति आधारित :-भारत के राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक हैं इसलिए उनकी सेना भी सबसे खास होती है। जो राष्ट्रपति की सेना होती है वह देश की अन्य सेनाओं से काफी खास होती है। वैसे तो भारत देश की सारी सेना ही राष्ट्रपति की सेना है परंतु राष्ट्रपति के पास कुछ खास सेनाएं होती हैं जिनको आप अक्सर 15 अगस्त या 26 जनवरी के परेड में देखते होंगे। इन सेनाओं में भी जातीय वर्ग को वरीयता दी जाती है। इस सेना की भर्ती में भी विशेष जाति को ही इसमें भाग लेने की अनुमति दी जाती है। वे विशेष जातियां सिर्फ तीन है जो इस प्रकार है राजपूत ,हिंदू जाट और सीख जाट। जब राष्ट्रपति की खास सेना भी जाति आधारित है तो अन्य सेनाओं में भी होना कोई बड़ी बात नहीं है।

  आइए अब उन विपक्ष और पक्ष के तर्कों को भी देख ले जो लोग इसके पक्ष में और विपक्ष में देते हैं। दोनों पहलू देखना अति आवश्यक है क्योंकि इसके बिना हम कुछ भी अपनी तरफ से फैसला नहीं कर सकते तो चलिए जानते हैं इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क।

            -: जातीय धारी रेजीमेंट के पक्ष में तर्क :-
1. यह नियम सिर्फ पैदल सेना में लागू है:- जाति आधारित भर्ती या रेजिमेंट जो भी है वह सिर्फ पैदल सेना में ही है सेना के बाकी हिस्सों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो किसी जाति विशेष को बढ़ावा दें या उसके नाम पर रखा जाए।
2. 200 साल पुरानी परंपरा है तोड़ना आसान नहीं:- यह कोई एक-दो साल की परंपरा नहीं है यह 200 साल पुरानी परंपरा है जिसको अचानक से तोड़ना आसान नहीं है। क्यों कि यह जीन जातियों या समुदाय के लिए बनाई गई हैं  अचानक से टूटने पर उनको अच्छा नहीं लगेगा ।उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचेगा।
3. इसे से सेना में एकता बनी रहती है:- इस जाति आधारित व्यवस्था से पैदल सेना में एकता बनी रहती है जो कि किसी भी सेना के लिए बहुत ही आवश्यक होती है। कहीं भी लड़ाई हो या कुछ भी हो सबसे पहले इन पैदल सेना को ही भेजा जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी प्रकार से उनमें एकता बनी रहे।
4. भर्ती प्रक्रिया आसान होती है:- इसे सेना में भर्ती प्रक्रिया आसान होती है। जैसे अगर राजपूतों को ही सेना में भर्ती करना है तो उनके लिए एक रैली निकाल दी जाती है। इस रैली में वही भाग लेते हैं जो उससे संबंधित होते हैं जिस से ज्यादा संख्या में कैंडिडेट इकट्ठा नहीं होते और भर्ती प्रक्रिया आसानी से संपन्न कर ली जाती है।
5.जाति आधारित रेजिमेंट में सिर्फ एक ही जाति नहीं होती:- बेशक यह जातियों के नाम पर आधारित रेजिमेंट होती है परंतु इसमें शामिल होने वाली सैनिक दल अलग-अलग जातियों के होते हैं। ऐसा नहीं है कि राजपूत रेजीमेंट में सिर्फ राजपूत होते हैं उनमें सिख, मुस्लिम, यादव आदि जातियां भी होती हैं।
        -:जाति आधारित रेजिमेंट के विपक्ष में तर्क:-
1. जातिवाद को बढ़ावा:- इस व्यवस्था से भारत देश में जातिवाद  को बढ़ावा मिलता है क्योंकि इसमें जिन जातियों के नाम से रेजिमेंट  होती है  वह जातियां अपने आप को काफी गौरवमई और दूसरों से अपने आप को ऊंचा समझती हैं।
2. एकता के खिलाफ:- जाति आधारित रेजीमेंट एकता की मूल भावना के भी खिलाफ है। क्योंकि यह लोगों को जाति धर्मों में बांटने का काम करती है जिससे एकता में कमी आने की संभावना ज्यादा होती है ।अतः यह उचित नहीं है।
3. समानता के अवसर के विरुद्ध:- भारतीय संविधान भारत के नागरिकों को सभी प्रकार के अवसरों में समानता की गारंटी देता है ।परंतु या जाति आधारित नियम इस समानता के अधिकार को आम नागरिकों को इससे वंचित रखता है। अतः सभी को समान अवसर देने की व्यवस्था होनी चाहिए।
4. जाति राष्ट्र से पहले की भावना:- अक्सर होता यह है कि राष्ट्र सबसे पहले होता है परंतु इस व्यवस्था से व्यक्ति जाति धर्म को राष्ट्र से पहले रखने लगता है। उसके लिए राष्ट्र छोटा हो जाता है और धर्म जात बड़ा हो जाता है।
5. अंग्रेजों की सोच को बढ़ावा:- इस व्यवस्था से 200 साल पुरानी अंग्रेजों की फूट डालो राज करो नीति को बढ़ावा मिलता है। जात पात में बांटना यह अंग्रेजो की 200 साल पुरानी सोच है तो क्या अभी भी इस सोच को लेकर साथ चलना उचित है।
6. जातीय समुदाय वीर नहीं होता व्यक्ति होता है:- जैसे कि अंग्रेजों का विचार था कि जाति और समुदाय वीर होते हैं कोई व्यक्ति भी नहीं होता । परंतु मनोवैज्ञानिक सोच से  देखा जाए तो यह बिल्कुल ही गलत है हर वर्ग, हर जाति, हर समुदाय में कोई ना कोई एक वीर योद्धा जरूर होता है तो यह तर्क बिल्कुल ही तर्कहीन है।
  
 निष्कर्ष:- जाति आधारित रेजीमेंट होने के बावजूद भी भारतीय सेना में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं है हमारी भारतीय सेना में देश भक्ति और एकता कूट-कूट कर भरी है। इसका परिणाम भी हमने कई बार देखा है पाकिस्तान को तीन बार धूल चटाया है ।कई सारे देशों में हमारी सेना ने शांति बहाल की है जैसे मालदीव और श्रीलंका। भारतीय सेना के कई बड़े बड़े कारनामे पूरी दुनिया में मशहूर है। हमारा भारत देश महानता और इसकी शान इन सैनिकों से ही है।
          परंतु भारत एक बहुत ही बड़ा विभिन्नताओ भरा देश है इसमें विभिन्न प्रकार की जाति धर्म समुदाय रहते हैं  तो  ऐसे ही विभिन्नताओ भरे देश में जाति आधारित रेजीमेंट रखना कितना उचित है इस पर चर्चा की जा सकती है। पर यदि देश में जाति आधारित रेजिमेंट होगी तो समय-समय पर विभिन्न जातियों और समुदाय के द्वारा अपनी अपनी जातियों के नाम पर रेजीमेंट बनाने की मांग होती रहेगी। इसका उदाहरण आप आरक्षण के नियम से देख सकते हैं जिसको लेकर समय-समय पर देश में दंगे और जातीय हिंसा होती रहती हैं क्योंकि विभिन्न जातियां आरक्षण की मांग करती हैं। हर चीज का एक समय होता है जो देश के हालात और समय को देखते हुए उसमें परिवर्तन लाना आवश्यक होता है। जैसे जाति आधारित आरक्षण में एक नया परिवर्तन आया गरीब  लोगों को 10 % आरक्षण दिया गया। ठीक वैसे ही इस जाति आधारित रेजिमेंट में कुछ बदलाव समय के हिसाब से किया जा सकता है।
भारत में जाति आधारित रेजिमेंट का इतिहास.... भारत में जाति आधारित रेजिमेंट का इतिहास.... Reviewed by ARJUN KUMAR on June 15, 2020 Rating: 5

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