अभी हाल में ही अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत से दवाइयों की मदद मांगी है कोरोना वायरस से लड़ने के लिए और उन्होंने धमकी भी दी है कि अगर भारत इसमें हमारा सहयोग नहीं करेगा तो हम भारत का भी आगे सहयोग नहीं करेंगे। ऐसे ही कुल लगभग 30 देश है जिन्होंने भारत से दवाइयों की मदद मांगी है और भारत ने कुछ देशों की मदद की भी है। ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो ने भारत की मदद से खुश होकर उन्होंने भारत देश को रामायण का हनुमान कहा है
आइए जानते हैं उन दवाइयों को जिसकी डिमांड पूरी दुनिया में है वह दवाइयां है हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वाइन और पेरासिटामोल। यदु दवाइयां करोना वायरस से लड़ने में बहुत सहायक हैं क्यों वह रोगी को सांंस लेने मे मदद करती है जिससे रोगी को वेटीलेटर की जरुरत नहीं पड़ती इसलिए पूरी दुनिया में इस दवा की बहुत ज्यादा मांग है ।सवाल यह भी मन में उठता है कि अगर हम दूसरे देशों की मदद ऐसे ही करते रहेंगे तो हमारे देश में कहीं दवाई कमी तो नहीं हो जाएगी क्योंकि हमारे देश में भी करोना वायरस का संक्रमण बढ़ता जा रहा है पर आपको जानकर खुशी होगी कि हमें इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हमारे पास जो भी दवाइयां कंपनियां हैं वह पहले 1 महीने में 20करोड़ दवाइयां बनाती थी अब उन्होंने सरकार की अपील पर 1 हफ्ते में 20करोड़ कदवाइयां बनाना शुरू कर दिया है। भारत पूरी दुनिया में 70 परसेंट की जो सप्लाई होती है वह अकेले भारत ही करता है।
पर क्या यह भारत बिना चाइना की मदद से अकेले कर पाता जवाब है नहीं कर पाता क्योंकि दवाइयां बनाने के लिए एपीआई की जरूरत होती है और यह एपीआई भारत 90 परसेंट दूसरे देशों से मंगाता है और इसमें दो तिहाई हिस्सा अकेला चाइना का है। अब यहां एपीआई क्या होता है जानते हैं यह पियाई के बारे में एपीआई व सामग्री है जो दवाई बनाने के काम आती है।
लॉक डाउन से पहले भारत को कोई चिंता नहीं थी क्योंकि चाइना को सारे आर्डर दिए जा चुके थे और माल की पूर्ति हो रही थी पर जैसे ही क्रोना का संक्रमण हुआ भारत को चिंतित होना स्वाभाविक था क्योंकि अगर एपीआई की सप्लाई सही समय पर नहीं होती तो हम अपने देश के लिए भी दवाइयों का उत्पादन नहीं कर पाते। पर जैसे ही लॉक डाउन हुआ सरकार को इस तरफ पूरा ध्यान गया और सरकार ने इस समस्या को देखते हुए एक कमेटी गठित की जिसके अध्यक्ष ईश्वर रेडी है, यह कमेटी यह देखेगी कि ऐसे लॉक डाउन में या किसी आपातकाल में हमारे देश में दवाइयों की पूर्ति किस तरह से प्रभावित ना हो।
2014 में ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा था कि जो एपीआई हम चाइना से मंगाते हैं उसको हमें कम करना चाहिए नहीं तो किसी दिन याद देश के लिए बड़ी समस्या बन जाएगा।
2013 में भी जब यूपीए की सरकार थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी थे उस समय भी एक कमेटी का गठन किया गया था उस कमेटी का नाम था यूएम कटोच। और इस कमेटी ने 2015 में अपनी रिपोर्ट दी और कहा कि भारत को एपीआई खुद ही बनाना चाहिए बेशक इसके लिए हमें अलग से पारक ही बनाना पड़े।
2017 में भी इसके लिए एक ड्राफ्ट बनाया गया पर वह सिर्फ ड्राफ्ट ही बना रह गया वह कुछ भी नहीं। अब यह मन में सवाल उठता होगा कि जब सभी लोग कह रहे हैं कि एपीआई का उत्पादन खुद ही अपने देश में होना चाहिए तो हम इसका उत्पाद क्यों नहीं करते हैं। इसका जवाब है कि एपीआई के उत्पादन में बहुत ज्यादा प्रदूषण होता है यह वायु प्रदूषण को बढ़ावा देता है और यह जल को काफी प्रभावित करता है इसीलिए इसके उत्पादन में सरकार कोई रुचि नहीं दिखाती।
पर अब समय के साथ-साथ काफी नई नई टेक्नोलॉजी आ चुकी है जैसे अमेरिका और यूरोप के देशों में यूपीआई के उत्पादन में जिस तकनीक का प्रयोग किया जाता है उसे पोलूशन बहुत कम होता है । भारत सरकार चाहे तो इस तकनीक का प्रयोग कर सकती है और कुछ कंपनियों को कुछ छूट के साथ इसका उत्पाद करने के लिए कह सकती है और यदि सरकार चाहे तो सरकारी कंपनियों को भी इसमें लगा सकती है। एपीआई का उत्पादन देश हित में ही होगा क्योंकि हम किसी देश पर निर्भर नहीं रहेंगे।
बिना चाइना की मदद से भारत कोई दवाई क्यों नहीं बना सकता
Reviewed by ARJUN KUMAR
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April 09, 2020
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