क्या आपको नहीं लगता हमारा समाज बदलता जा रहा है। अब हमारे समाज को तुरंत न्याय चाहिए और सही भी है तुरंत न्याय पाना क्योंकि जब न्याय देर से मिलता है तो एक तरह से अन्याय ही होता है। ठीक ऐसे ही हुआ विकास दुबे के केस में जब उसने 8 पुलिसकर्मियों की हत्या की थी तो पूरे देश हैं और खासकर उत्तर प्रदेश में यह जोरों पर मांग की थी उसको जल्दी से जल्दी पकड़ा जाए और उसे सीधे मार दिया जाए। विकास दुबे के साथ हुआ भी ऐसा ही, पकड़ने केे कुछ महज घंटे बाद उसका एनकाउंटर कर दिया गया। कुछ लोग इस एनकाउंटर केे समर्थन मेंं है कुछ इसके विरोध में है। समर्थन और विरोध का पक्ष जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कि हमारे देश में एनकाउंटर को लेकर सुप्रीम कोर्ट मानव अधिकार आयोग और भारतीय दंड संहिता क्याा कहती है।
"पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र सरकार" 2014 के केस में सुप्रीम कोर्ट ने एनकाउंटर के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र सरकार के मामले में पुलिस मुठभेड़ में हुई मौतों एवं गंभीर रूप से घायल होने की घटनाओं की जांच के लिए 16 दिशा निर्देश जारी किए थे। उस समय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा और न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन ने व्यवस्था दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान से जीने का अधिकार निहित है । इस केस में यह व्यवस्था दी थी कि पुलिस मुठभेड़ में किसी के मारे जाने से कानून के शासन तथा अपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता आहत होती है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने जो दिशा निर्देश दिए थे वह इस प्रकार है:-
1. जब कभी पुलिस को अपराधी के गतिविधियों के बारे में कोई खुफिया जानकारी या सुराग मिलता है तो इसे लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप में संक्षिप्त तौर पर रखा जाना चाहिए। लेकिन उसमें संदिग्ध के ब्योरे अथवा उसके संभावित गतिविधियों के ठिकाने का जिक्र नहीं किया जाना चाहिए यदि इसी प्रकार की खुफिया जानकारी अथवा सुराग वरिष्ठ अधिकारी को प्राप्त होती है तो उसे भी इस प्रकार रखें जाना चाहिए कि संदिग्ध की गतिविधियां या उसके लोकेशन के बारे में किसी को नहीं बताया जाना चाहिए।
2. किसी खुफिया जानकारी या सुराग मिलने के बाद यदि मुठभेड़ होती है और आग्नेयशस्त्र का इस्तेमाल पुलिस करती है तथा इसमें किसी की जान जाती है तो एक प्राथमिकता दर्ज कराई जानी चाहिए। इसे संहिता की धारा 157 के तहत अदालत को अग्रसारित किया जाना चाहिए और इस क्रम संहिता की धारा 158 में वर्णित प्रक्रिया का अनुसरण किया जाना चाहिए।
3. अपराध जांच विभाग( सीआईडी) अथवा दूसरे पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा घटना मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी/ जांच मुठभेड़ में शामिल पुलिस टीम के प्रमुख से कम से कम एक पदों पर के वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में होनी चाहिए।
4. पुलिस फायरिंग के कारण होने वाली सभी मौतों के मामलों में दंड प्रक्रिया सीआरपीसी की धारा 176 के तहत नीरपवाद रूप से मजिस्ट्रेट जांच कराई जानी चाहिए और इसके बाद एक रिपोर्ट उस न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजी जानी चाहिए जो सीआरपीसी की धारा 190 के तहत अधिकृत हो।
5. जब तक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच को लेकर गंभीर संदेह ना हो तब तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को इन मामलों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए हालांकि घटना की सूचना परिस्थिति अनुसार एनएचआरसी या राज्य मानवाधिकार आयोग को बिना किसी विलंब के दे दी जानी चाहिए।
6. घायल अपराधी/ पीड़ित को चिकित्सा सहायता और मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर के समक्ष दर्ज उसका बयान फिटनेस सर्टिफिकेट के साथ उसे उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
7. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्राथमिकी डायरी एंट्री ,पंचनामा, स्केच आदि को संबंधित अदालत को भेजने में विलंब ना हो।
8. घटना की पूरी जांच के बाद रिपोर्ट सीआरपीसी की धारा 173 के तहत सक्षम अदालत के पास भेजी जानी चाहिए ।जांच अधिकारी द्वारा पेश आरोपपत्र के मुताबिक मुकदमे का निपटारा किया जाना चाहिए।
9. मौत की स्थिति में कथित अपराधी के निकट परिजन को अतिशीघ्र सूचित किया जाना चाहिए।
10. पुलिस फायरिंग में मौतों की स्थिति में सभी मामलों का छमाही ब्यौरा पुलिस महानिदेशक द्वारा मानव अधिकार आयोग को भेजना जाना चाहिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि छमाही ब्योरा हर साल क्रमश जनवरी और जुलाई की 15 तारीख तक मानव अधिकार आयोग को मिल जाए।
11. जांच पूरी होने के बाद यदि ऐसा सच प्राप्त होता है जिससे यह प्रतीत होता है कि जिस हथियार से मृत्यु हुई वह आईपीसी की धारा के तहत अपराध की श्रेणी में आता है तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तुरंत शीघ्र की जानी चाहिए और उसे निलंबित कर दिया जाना चाहिए।
12. पुलिस मुठभेड़ में मारे गए व्यक्ति के आश्रितों को मुआवजा देने की जहां तक बात है तो इसके लिए आईपीसी की धारा 357 ए पर अमल किया जाना चाहिए।
13. संबंधित अधिकारी को अपने हथियार एवं अन्य सामग्रियों की जांच एजेंसी द्वारा आवश्यकता अनुसार फॉरेंसिक और बैलेस्टिक विश्लेषण के लिए अपने हथियार एवं अन्य सामग्रियों को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। यह संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत प्रदत्त अधिकारों के अनुरूप हो।
14. घटना की जानकारी पुलिस अधिकारी के परिवार को भी दी जानी चाहिए तथा यदि उसे वकील एवं परामर्शदाता की सेवा की जरूरत हो तो इसका भी प्रस्ताव दिया जाना चाहिए।
15. घटना के तुरंत बाद संबंधित अधिकारियों को ना तो बिना बारी के पदोन्नति दी जानी चाहिए ना ही कोई वीरता पुरस्कार दिया जाना चाहिए ।हर हाल में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह पुरस्कार तभी दिया जाए या इसकी सिफारिश तभी की जाए जब संबंधित अधिकारियों की वीरता पर कोई संदेश ना हो।
16. यदि पीड़ित का परिजन या महसूस करता है कि उपरोक्त प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है या स्वतंत्र जांच में किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका हो या उपरोक्त वर्णित किसी भी अधिकारी की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है तो वह अधिकारी क्षेत्र के वाले सत्र न्यायाधीश से शिकायत कर सकते हैं इस प्रकार की शिकायत के बाद संबंधित सत्र न्यायाधीश शिकायत के गुण दोष के निर्णय करेगा और शिकायत का निपटारा करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन दिशा निर्देशों का पालन संपूर्ण प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए मानक प्रक्रिया के तौर पर किया जाएगा। न्यायमूर्ति लोढ़ा ने अपने उस फैसले में कहा था "अनुच्छेद 21 में निहित गारंटी प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध है और यहां तक कि सरकार भी इस अधिकार का हनन नहीं कर सकती। अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त अधिकार एवं संविधान के अन्य प्रावधानोंं के समान ही कई और संविधानिक प्रावधान भी निजी स्वतंत्रता ,सम्मान और मौलिक मानव अधिकारों की रक्षा करते हैं। नागरिकों के जीवन एवंं निजी स्वतंत्ररता की रक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद पुलिस मुठभेड़ में मौत की घटना बदस्तूर जारी है"
मार्च 1987 में तत्कालीन राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था और उसमें उन्होंने लिखा था " आयोग को कई जगहों से और गैर सरकारी संगठनों से लगातार शिकायतें मिल रही है कि पुलिस के जरिए फर्जी एनकाउंटर लगातार बढ़ रहे हैं साथ ही पुलिस अभियुक्तों को तय नियमों के आधार पर दोषी साबित करने की जगह उन्हें मारने की तरजीह दे रही है "
जस्टिस एमएन वेंकटचलैया साल 1993- 94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे उन्होंने लिखा था कि " हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने कानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी"
सिर्फ दो ही हालात में इस तरह की मौतों को अपराध नहीं माना जा सकता,
पहला अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए।
दूसरा सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करने की कोशिश जिसने वह अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है इस कोशिश में अपराधी की मौत हो जाए।
राष्ट्रीय मानव आयोग ने सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देशित किया है कि वह पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियमों का पालन करें वह नियम इस प्रकार हैं:-
1. जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी प्राप्त हो तो वह इसको तुरंत रजिस्ट्रेशन में दर्ज करें।
2. जैसे ही किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की शंका जाहिर की जाए तो उसकी जांच करना जरूरी है। जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की सीआईडी के जरिए होनी चाहिए।
3. अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
12 मई 2010 को भी एनएचआरसी के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस जीपी माथुर ने कहा था कि पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है। अपने इस नोट में एनएचआरसी ने यह भी कहा था कि बहुत से राज्यों में उनके बनाए नियमों का पालन नहीं होता है।
एनएचआरसी ने इसके बाद कुछ और दिशानिर्देश इस में जोड़े:-
जब कभी पुलिस पर किसी तरह के गैर इरादतन हत्या के आरोप लगे तो उसके खिलाफ आईपीसी के तहत मामला दर्ज होना चाहिए घटना में मारे गए लोगों की तीन महीनों के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए।
राज्य में पुलिस की कार्रवाई के दौरान मौत के सभी मामलों की रिपोर्ट 48 घंटे के भीतर एनएचआरसी को सौंपीनी चाहिए। इसके 3 महीने के बाद पुलिस को आयोग के पास एक रिपोर्ट भेजने जरूरी है जिसमें घटना की पूरी जानकारी ,पोस्टमार्टम रिपोर्ट ,जांच रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट शामिल होनी चाहिए।
इन सब के बावजूद भी पुलिस एनकाउंटर पूरे जोर-शोर से करती रही है ।एनकाउंटर करना कितना सही है और कितना गलत यह सबके अपने-अपने विचार हो सकते हैं। पर विकास दुबे का एनकाउंटर काफी सुर्खियों में है क्योंकि जिस तरह से उसको एनकाउंटर किया गया वह सवालों के घेरे में है। अब बात करते हैं जो लोग यह कहते हैं कि एनकाउंटर करना सही है और जो लोग कहते हैं एनकाउंटर करना गलत है उनके विचारों को जाना जरूरी है।
एनकाउंटर के पक्ष में तर्क:-
1. इससे लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता तुरंत ही सजा मिल जाती है
2. बड़े अपराधी अदालत से बच जाते हैं इसलिए उनका एनकाउंटर ही सही होता है।
3. अदालत की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है इसलिए एनकाउंटर सही।
4. इससे अपराधियों में डर बैठेगा जिससे अपराध कम होगा।
5. सीधी एनकाउंटर करने से कोई भी अपराध की राह पर नहीं जाएगा क्योंकि उनको मौत का डर होगा।
6. एक कातिल के अपराधी को कोई अधिकार नहीं मिलना चाहिए इसलिए उसका मरना आवश्यक है।
7. मौत के डर से एक सभ्य समाज की स्थापना होगी जिसमें जुर्म नहीं होगा।
एनकाउंटर के विपक्ष में तर्क:-
1. यह मानव के अधिकारों का हनन करती है।
2. पुलिस का काम पकड़ना है ना की सजा देना।
3. पुलिस एनकाउंटर अपनी नाकामी छुपाने के लिए करती है।
4. एनकाउंटर अक्सर बदले के रूप में किया जाता है।
5. सजा देना अदालत का काम है पुलिस का नहीं।
6. यह पुलिस बल का सबसे ज्यादा दुरुपयोग है।
7. इससे अपराध और बढ़ता है क्योंकि अपराधी को पता है उसको मरना ही है इसलिए मरने से पहले जो मर्जी कर लो।
8. यह भारतीय संविधान का अपमान है क्योंकि भारतीय संविधान में एक नियमावली है जिससे अपराधी को सजा मिलता है।
9. इससे एक सभ्य समाज की स्थापना नहीं होगी, इससे एक अपराधिक समाज की स्थापना होगी। क्योंकि कोई भी पुलिस प्रशासन पर विश्वास नहीं करेगा इसलिए वह खुद ही फैसला कर लेंगे।
उत्तर प्रदेश में ही सबसे ज्यादा एनकाउंटर के मामले क्यों:- राष्ट्रीय मानव आयोग के अनुसार 2000 से लेकर 2017 तक 1,782 फेक एनकाउंटर हुए हैं।इसमें भी सबसे ज्यादा एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में हुए हैं। 44.55 परसेंट एनकाउंटर सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुए है। इसका मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश की सरकार चाहे कोई भी हो वह अपना काम सही से नहीं कर पाती अगर वहां सही से करती तो इतनी ज्यादा अपराधी इस प्रदेश में नहीं होते। अब जब सरकार को लगता है कि यह अपराधी इनके लिए सिरदर्द बन जाएंगे तो वह उनका एनकाउंटर करवा देती है। विकास दुबे के बारे में और क्या कहा जाए आप सब लोग न्यूज़ चैनल समाचार सुनते ही होंगे उसमें विकास दुबे के रिश्ते बड़े-बड़े नेताओं से लेकर अफसरों तक दर्शाए गए हैं जो कि उसकी मौत के साथ दफन हो गए हैं।राष्ट्रीय मानव आयोग ने 160 फेक एनकाउंटर के शो में 9.7 करोड़ रुपए दिए हैं।
अब विकास दुबे का एनकाउंटर ही ले लीजिए। इस पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। पूर्व डी. जे. पी. डॉ .एनसी अस्थाना इस पूरे इन काउंटर को ही झूठा बता दिया है और कहां है कि यह पुलिस ने जानबूझकर किया है। बाकी कुछ बॉलीवुड के कलाकारों से लेकर कुछ समाज सेवकों ने इस एनकाउंटर पर सवाल उठाया है। हैरानी तो तब हो जाती है जिन आठ पुलिसकर्मियों को विकास दुबे ने मारा था उनमें से एक सुल्तान सिंह की पत्नी उर्मिला वर्मा ने भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठाया है क्योंकि वह कह रही है कि यह गलत है। वह कह रही है कि अगर विकास दुबे जिंदा रहता तो उसके द्वारा बड़े मुजरिमों तक पहुंचा जा सकता था जो सत्ता में बैठे हैं और जो प्रशासन में बैठे हैं। ना जाने कितने और विकास दुबे यह फिर पैदा कर देंगे।
क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं जिसको पुलिस और अदालत पर भरोसा नहीं है:- हम ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जो एनकाउंटर होने पर खुश होता है वह नहीं चाहता है कि अदालत के चक्कर में पढ़ा जाए। पिछले साल हैदराबाद में ऐसा ही हुआ था जब चार आरोपियों को पुलिस ने सीधे ही एनकाउंटर कर दिया। ऐसा करने पर सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लोगों ने खूब जश्न मनाया और पुलिस की प्रशंसा भी की।पर क्या सच में यह सही है। इस तरह तो पुलिस किसी मासूम को भी पकड़ कर एनकाउंटर कर देगी और कह देगी कि उसने यह जुर्म किया था बेशक उसने वह जुर्म ना किया हो क्योंकि लोग तो पुलिस के साथ खड़े हैं। पर एक दिन आप लोगों का भी ऐसे नंबर आ सकता है क्योंकि जब कोई नियम से परे हो जाता है तो वह अपनी मनमानी करने लगता है और मनमानी करने का मतलब है वह कुछ भी कर सकता है।
लोगों का गुस्सा भी ठीक है क्योंकि सरकार ने लोगों को मजबूर कर दिया है ऐसा सोचने पर। हमारी आबादी बढ़ती जा रही है उस हिसाब से ना तो हमारे न्याय प्रणाली बढ़ रही है और ना ही जजों की नियुक्ति हो रही है जिससे अदालतों में केस दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं और केस की तारीख आते आते मुजरिम अपनी जिंदगी जी कर मर चुका होता है और इंसाफ पाने वाला तो वैसे ही इंतजार में मर जाता है। इसलिए सरकार को इस तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए। जैसे हमारी आबादी है उसी हिसाब से हमारी न्याय प्रणाली भी बननी चाहिए ताकि जल्दी से जल्दी लोगों को इंसाफ मिले और वह कानून में अपना विश्वास बनाए रखें। यह विश्वास ही भारतीय समाज को बचा के रखेगा और लोकतंत्र हमारे देश में बचा रहेगा वरना ऐसा ही चलता रहा तो अराजकता बढ़ती जाएगी और फिर कोई कानून पर विश्वास नहीं करेगा।
,एनकाउंटर पर क्या कहती है सीआरपीसी की धारा.....
Reviewed by ARJUN KUMAR
on
July 12, 2020
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Reviewed by ARJUN KUMAR
on
July 12, 2020
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very good sir
ReplyDeleteThanks sir
DeleteSar Ji mera dream11 mein passport nahi le raha hai
ReplyDeleteYour last conclusion is very much right.... Hum bohot galat taraf ja raha hai...
ReplyDeleteYour last conclusion is very much right.... Hum bohot galat taraf ja raha hai...
ReplyDeleteThanks a lot of, your comments is very important for me
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